कांहा वो दिन थे और काहा ये दिन
कांहा वो दिन थे और काहा ये दिन है
वो था हँसता खेलता बचपन
और आज है तपती रेत मे चलने के दिन
तब आंसू बहते थे जिद्द के लिए
और आज आंसू बहते है मज़बूरी के लिए
और आज हसने के लिए कोई वजह मिलती नही
तब साथ था जग सारा
और आज अपने भी पराये हो गये
GOOOD WRITER
ReplyDeleteRightly said a good writer
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